महात्मा गाँधी की मदद से बं’द होने से ब’ची थी जा’मिया,कहा था- जामिया को चलाएंगे चाहे भी’ख़ ही क्यों न मां’गनी पड़े

ना;ग’रि’कता सं’शो’ध”न का’नून को लेकर पूरे देश मे हिं’सा और वि’रो’ध जारी है। लोग स’ड़क पर उतर रहे है। रै’लि’यां नि’काली जा रही है। इस का’नून के तहत मु’स्लि’मो को ना’ग’रि’क’ता का’नू’न में शामिल नही किया गया,यानी उन्हें भारत की ना’ग’रि’कता साबित करनी होगी। इस वि’रो’ध को लेकर बॉ’ली’वुड के एक्टर हो या फिर आम जनता सभी वि’रो’ध कर रहे है। इसका वि’रो’ध दि’ल्ली में स्थित जा’मिया यू’नि’वर्सिटी में हो रहा है और जा’मिया के छा’त्रों के अनुसार यही प्रो;’टे’स्ट का मु’ख्य कें’द्र बन गया है।

क्या आपको पता है कि जा’मिया आज से नही बल्कि गां’धीजी के समय से है। आइये तो जानते है कि गांधी ने जामिया के बारे में क्या कहा था। आ’जादी से पहले भी जामिया कई बार आर्थिक संकटो से गुजरी थी। कई बार तो जामिया को बं’द करने की भी नोबत आ गई थी। ऐसे में जब अजमल ने ग़ांधी से कहा तो उन्होंने कहा कि में जा’मिया इस्ला’मि’या के लिए पूरी मदद करूंगा।

चाहे से मु’झे क’टोरा लेकर भी’ख क्यो मां’ग’ना पढ़े। आपको बता दे कि लेखक और पत्रकार विवेक शुक्ला ने अपनी किताब ग़ांधी डेल्ही एंड बियांड में इस बारे में विस्तार से लिखा है कि विवेक ने इसकी विस्तार से वि’वे’च’ना की है। उन्होंने कहा है कि पहले ये अलीगढ़ में थी। इसको दिल्ली लाने में ग़ांधी ने पूरी कोशिश की थी। इसको दिल्ली में 1925 में लाया गया था। पहले ये करोलबाग में थी।

बाद में इसको उचित जगह बनाया गया। ग़ांधी ने पूरी तरह से इसके लिए मदद की। आज भी जामिया पूरे देश मे बहुत बड़ी यूनिवर्सिटी है। उनकी अपील पर जमनालाल बजाज ने यूनिवर्सिटी के लिए बहुत बड़ी राशि दी थी। इससे जा’मिया को बं”द होने से बचा लिया गया। वि’वेक ने ये भी बताया है कि ग़ांधी जी का पो’ता भी जामिया में पढ़ता था। वो रसिक लाल थे। जो कि गान्धीजी के बड़े बेटे हरिलाल के सन्तान थे।

इसके बाद गान्धी’जी के छोटे बेटे देवदास ने भी जा’मिया से अंग्रेजी और हिंदी की कोचिंग की थी। इसके बाद वो हिन्दुस्तान टाइम्स में स’म्पादक बने। विवेक शुक्ला बताते है कि 1947 में जब ‘दे’श का बंट’वा’रा हो रहा था , उस समय दिल्ली में भ’यं’कर दं’गे हो रहे थे। जामिया को बहुत नु’कसा’न हुआ था। इसको देखने के लिए गा’न्धीजी वहां पर पहुँचे थे। जामिया के लाइब्रेरी और बिल्डिं’ग्स को भी नु’क’सा’न हुआ था।

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