मुहर्रम वाले महीने में ग्वालियर में शादी-विवाह नहीं करता था सिंधिया परिवार, जानें क्या थी वजह, हजरत ईमाम हुसैन से ….

ग्वा’लियर और सिं’धिया राज’घरा’ने एक दूसरे के सहा’रे भी रहे है। 250सालों से अधिक सिं’धिया राज परिवार ग्वा’लियर की सं’स्कृ’ति, प’रम्परा औऱ विरा’सत को स’जोता सँवारता भी रहा है। एक वक्त ऐसा था जब सिं’धिया परिवार मो’हर्रम के महीने में शादी ब्याह, कोई भी शुभ काम को नही करता था।

मो’ह’र्रम मु’स्लि’म स’मु’दाय के गम का महीना भी कहा जाता है। ऐसे में सिं’धिया राजघ’राना मुस्लि’म स’मुदाय की भावना’ओ का आ’दर भी करता था। अगर मो’हर्र’म वाले महीने में कोई शादी होती भी थी तो शहर से बाहर ही हुआ करती थी। बता दे कि वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राशीद किद’वई ने अपनी किताब द हाउस ऑफ सिंधियाज,द सगा ऑफ

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पा’वर,पॉलि’टिक्स एंड ट्रेनिंग में इस किस्से को बयांन भी दिया है। कभी रा’जघ’राने में बहुत ही ज्यादा मु’स्लि’म स’मुदा’य की भावना’ओ की बहुत क’द्र कीजाती थी। द लल्लनटॉप सेबातचीत करते हुए किदवई ने बताया है कि यदि सि’न्धिया परिवार के किसी श’ख्स को मो’हर्रम के मही’ने में शा’दी करना होता था

तो वो ग्वालियर से 100 किलोमीटर दूर जाना भी पड़ता था। जिससे मु’स्लि’म समु’दाय को ठेस नही पहुचे।जबकि वह मुस्लिम आबादी 6 प्रतिशत से भी कम थी। सिं’धिया परि’वार की तारीफ करते हुए किदवई ने बताया है कि सूफी’संत मंसू’र शा’ह ने भी कभी परिवार की मदद की थी।

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आज भी जब मो’हर्र्म या कोई कार्य’क्रम होता है तो सिंधिया परि’वार का मुखिया’ शिर’कत करता है और कार्य’क्रम का शु’भारंभ भी करता रहा है। सिं’धि’या परिवार ऐसा परिवार है जो सिर्फ दि’खावे के लिए का पाठ नही पढ़ाता था।

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