हिजा’बी महि’ला श’मशाद ने मेहनत से सीखी गुलाब की खेती, गरी’बी से उभ’री और अब क’मा रही हर साल लाखों रूप’ये

अगर इंसा’न चा’हे तो ए’क छो’टे से बिज;ने’स से भी अ’पनी जिंद’गी को ‘स’वारने भी चा’हे तो सवा’र सक’ता है और एक इं’सा’न की मे’ह’नत, हि’म्मत और हौ’सले के सा’थ ही ऐ’सा मुम’कि’न हो सकता है। ‘खे’तीक’रना ‘ एक पे’शा है।

जिसमे आ’प कई त’रह की ची’जों को उ’त’पन्न करके बहु’त सारे प्रयो’ग करस’कते हो। अ’ना’ज से ले’कर फु’ल’त’क उ’गा’कर भी क’मा’ई कर सकते हो। गु’ज’रात की रह’ने वा’ली ए’क द’म्प’प्ति की एक ऐ’सी ही क’हा’नी है जि’न्होंने गु’ला’ब की खे’ती करके अपनी कि’स्म’त को पू’री तर’ह से बद’ल दिया है।

rose farming news

यंह क’हा’नी है एक मुस्लि;म प’रि’वार नव’सा’री में रह’ने वा’ले जा;किर मु’ल्ला और उन’की प’त्नी श’म’शाद जाकि;र हु;सैन मु’ल्ला की। इस परि’वार को पह’ले का’फी मु”श्कि’लों का सा’मना करना प’ड़ा। ह’र पारि;वारि’क रि’श्तों में क’ही न क’ही म’त’भे’द हो’ते’रहते है। इनके सा’थ भी ऐ’सा ही हु’आ।यह अपने ब;च्चों को ले’कर अ’लग रह’ने लगे। उनके पा’स आ’धा एक’ड़ जमी’न थी।

जिसमे उ’न्होंने क’म ज”गह में ही र’हने के लिए घ’र भी ब’ना’या और खे’ती कर’ना ‘शु’रू क’र दि’या। जा’किर बता’ते है कि ह’म अप’ने खे’त मे स’ब्जि”यां उगा”कर बेच’ते थे। ले’कि’न क’ई बा’र उ’प’ज इत’नी क’म हो’ती थी कि ह’मे दुस”रो से सब्जि”यां ले’ना प’ड़ता था। इसलिए ह’में ‘aPNE भ’र’ण पो’ष’ण के लिए कोई दू’स’रा रा’स्ता ढूं”ढ’ना था।

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इस बारे में जा”KIर की प’त्नी शम’शा’द बताती है कि हमारी जमी’न पर दो दे’सी गु’लाब के पौ;धे ल;गे हु’ए थे। मैं सा’ल 2014 से ही गुला’ब फू’ल से अ’पने ब’च्चों के लिए गु’ल’कंद बना’ती थी। मैंने जाकि’र से क;हा किअ’गर हम इस बि’जने’स को आगे ब’ना पाए तो बहुत अ’च्छा होगा।

इसके बाद दो’नो अप’नी खे’ती पर ध्या’न दे’ना शु’रू कर दिया।जब से उन्हों’ने गु’ला’ब से जै’विक’तरी’को से गुलकं’द, गुला’बजलऔर चेहरे पर लगा’ने के लिएफेस’ पै’क भी शु’रु कर दि’या। इसके बा’द उनकी आय हर माह 25 हजार हो गई।

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शम;शा’द क’ह’ती है कि ह’मे इ’स बा’रे में न’ही प’ता था कि य’ह उत्पा;द किस लिए का’म मे आ’ते है। इस तरह जा;किर ने ह’मारे एक पा’रिवा;रिक डॉ;क्टर से मा;लूम किया।उन्हों’ने हमें ब’ता’या कि गु;लकंद, पेट मे सूजन,ख’रा’श, अ’ल्स’र और पा’चन सम;स्याओं का इ;लाज क’रने में म’दद करता है।इस’के अ’ला’वा भी गर्भ;वती म;हि;लाओं के लिए भी अच्छा होता है।

श;मशाद कह’ती है कि मुझे विश्वा’स था एक दिन ह’म क’ड़ी मेह;नत कर’गे, तोस;फ़’ल ज’रूर होंगे। हमे अपने क’मसे ला’भ तो मि’ल रहा है लेकिन स’बसे ज्या’दा खु;शी इस बात की है कि ग्रा;हक हमे उत्पाद खरीद;ने के लिए कॉ’ल कर रहे है।’

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