Surah Yaseen Read Online – Listen to Yasin, Download Audio & PDF – Quran Wazaif

Surah Yaseen Read Online – Listen to Yasin, Download Audio & PDF – Quran Wazaif

Surah yaseen in hindi: सूरह यासीन  ASSALAMU AALIKUM  . Aaj Hum Apko Surah Yaseen Tilawat ki Fazilat ke bare me batayege. hmne is article me suruah yasin ( yaseen ) ko hindi or arbic me post kiya hai . iske sath hi hmne surah yaseen ka tarjuma bhi hindi me post kiya hai .

सूरह यासीन से होने वाली बरकतें के बारे में मुख्य पॉइंट

(सूरह यासीन ) मरने वाले के पास पढ़ना से क्या होगा ? जैसा कि आपकों पता है कि हम आपको सूरह यासीन की बरकतें के बारे में विस्तृत जानकारी दे रहे है । इसमें सबसे पहले बात कर रहे है मरने वाले के पढ़ने से क्या फायदा होगा ? जी, हाँ … जब कोई शख्स आखिरी सांस लेते समय या जिंदगी के आखिरी दिनों में जब तबियत खराब हो तब सूरह यासीन को पढ़ा जाता है । और इसे पढ़ना सुन्नत है । सूरह यासीन को पढ़ने से सकरात की तकलीफ आसान हो जाती है ।

खाने में बरकत के लिए सूरह यासीन पढ़ना कैसा ?
जी हां, सूरह यासीन को खाने में बरकत के लिए पढ़ा जाता है इससे खाने में बरकतें होती है । दूसरों के दावत में भी इसे पढ़ना चाहिए ।

बच्चे की पैदायश के वक़्त सूरह यासीन पढ़ना कैसा है ?
जब बच्चे की पैदाइश हो और यानी बच्चे के पैदा होने के वक़्त दर्द के मौके पर इसे पढ़ा जाता है । सूरह यासीन को पानी पर 3 बार दम करके पिलाने से विलादत में आसानी होती है ।

बादशाह या दुश्मन का यदि ख़ौफ़ हो तब सूरह यासीन पढ़ना कैसा?
हदीस में है कि जब दुश्मन का डर लगे या उससे कुछ नुकसान होने का खतरा हो, ख़ौफ़ हो तो इस सूरह को पढ़ा जाने से ख़ौफ़ जाता रहेगा ।

मुश्किल या मुसीबत के वक़्त सूरह यासीन पढ़ना कैसा है ?
सूरह यासीन को मुश्किल में पढ़ा जाता है और इसे किसी की मुसीबत के समय पढ़ने से हर तकलीफ दूर होती है । मौलाना ने फरमाया है कि 41 बार सूरह यासीन पढ़ने से बड़ी बड़ी मुश्किल दूर होती चली जाती है ।

सूरह यासीन को रोजाना पढ़ना चाहिए?
जी हां, सूरह यासीन को रोजाना पढ़ने से कई तरह की बरकतें , कई बालाओ से छुटकारा और दिली इच्छा पूरी होती है । सूरह यासीन को कुरान पाक का दिल भी कहा जाता है ।

हर चीज का दिल होता है उसी तरह उम्मते मुहम्मदी के मुक़द्दस किताब कुरआन मजीद का भी दिल सूरह यासीन शरीफ है । सूरह यासीन को पढ़ने से। आपको क्या फायदे होंगे हम आपको बताने जा रहे हैं । सबसे पहले … कुरान पाक को 1 बार पढ़ने से 10 कुरान पाक खत्म करने का सवाब अता फरमाता है।

प्यारे हबीब सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया है कि मरने वाले शक्स के पास सूरह यासीन पढ़ने से , इसकी बरकत से रूह आसानी से कब्ज की जाती हैं ।

मरहूम के इंतेक़ाल के बाद सूरह यासीन को पढ़कर इसका सवाब मरहुमीन को पहुचाए । उसके गुनाह बक्श दिए जाते हैं कब्र पर सूरह यासीन को पढ़ा जाता है तो कब्र में शख्स के गुनाह को माफ कर दिया जाता हैं ।

हज़रत मोहम्मद सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया है कि जो शख्स रात में यासीन शरीफ को पढ़ कर सोता है तो वह सुबह बख्श दिया जाता है ।

प्यारे हबीब मोहम्मद मुस्तुफा सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया है कि यासीन शरीफ पढ़ने से 10 बरकतें हासिल होगी जो निम्निलिखित हैं ।

भूखा पढ़ेगा तो खुशहाल हो जाएगा। प्यासा पढ़ेगा तो सैराब हो जाएगा । फकीर पढ़ेगा तो उसे कपड़े मिल जाएंगे। बिना बीवी वाला पढ़ेगा तो बीवी मिल जाएगी ।डरा हुआ शख्स पढ़ेगा तो ख़ौफ़ दूर हो जाएगा। सूरह यासीन को कैदी अगर पढ़ेगा तो ख़ौफ़ दूर होगा । कैदी पढ़ेगा तो जल्द inshaAllah आज़ाद होगा । मुसाफिर इस सूरह को पढ़ेगा तो सफर में आसानी होगी । कर्जदार पढ़ेगा तो कर्ज दूर होगा। यदि कोई चीज आपकी गुम हो जाए तो गुमी हुई चीज मिल जाएगी ।मरने वाले के पास इसे पढ़ेगा तो रूह कब्ज होने में आसानी होगी ।

यदि कोई शख्स सूरह यासीन को पढ़कर दम करा जाता है तो शैतानी साया दूर होता है और प्रेशनिस ए निजात मिलती है । सूरह यासीन को जुमा के रोज़ पढ़ने से हर हाज़त दूर होगी ।

सोते वक्त यासीन को पढ़ लिया और शख्स सोते हुए फ़ौत हो गया तो उसे शहीद का दर्जा दिया जाता है । जो शख्स अपने माँ बाप की कब्र पर यासीन को पढ़ता है तो उसकी बख़्सिस हो जाती है ।

सूरह यासीन को रोजी में बरकत के लिए पढ़ा जाता है तो रोजी में बरकत हो जाती है । जो शख्स मुसीबत के समय इसे पढ़ता है तो उसकी मुसीबत दूर हो जाती है । जो किसी को पढ़कर सूरह यासीन सुनाएगा तो 20 हज का सवाब मिलेगा और जो सुनेगा उसे 10 दीनार खैरात का सवाब अता किया जाएगा । जो बीमार शख्स हो उस पर दम किया जाता है यासीन सूरह का तो उसे तंदरुस्ती मिलेगी। और जो शख्स बे औलाद हो उसे औलाद अता होगी ।

अल्लाह तबारक व तआला हमे सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमाए और हमे सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमाए । आमीन ।

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Surah Yaseen ( सूरह यासीन ) Ki Fazilat In Hindi surah Yaseen Ki Azmat

हज़रत इमाम जाफर का सूरह यासीन के बारे में बयान ?
हजरत इमाम जाफर सादिक अ स फरमाते है कि कुरान पाक का दिल सूरह यासीन को कहा जाता है । जो शख्स सुबह सूरह यासीन को पढ़ेगा वो अल्लाह तआला की अमान में रहेगा । और जो शख्स सूरह यासीन को सोने के वक़्त तिलावत करेगा तो उस पर 1000 फ़रिश्ते अल्लाह तबारक व तआला मुकर्रर कर देता है । सुभानअल्लाह । और वो फ़रिश्ते उसके हक़ में दुआ करेंगे । इसके इंतेक़ाल के बाद इसके जनाजे को सलाम करेंगे और कब्र में इसके साथ रहेंगे ।

हज़रत मोहम्मद सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया है कि जो कोई भी दिन की शुरुआत सूरह यासीन पढ़ता है, उस दिन उसकी सभी जरूरतें पूरी हो जाएंगी।

सुब्हान अल्लाह , सुब्हान अल्लाह .… प्यारे नबी इरशाद फरमा रहे है कि सुबह यानी आप फज्र की नमाज के बाद कुरआन पाक के दिल की सूरह को पढ़ते है कि उसकी सभी जरूरत पूरी हो जाएगी इस हदीस को अता बिन अबी रिबाह से नकल किया गया है ।

सुबह से लेकर शाम तक बरकत :- सूरह यासीन को जो कोई शख्स सुबह पढ़ता है वो शाम तक खुश ओ खुर्रम रहता है । और कोई शख्स इसे रात में पढ़ता है तो वह सुबह तक खुश ओ खुर्रम रहेगा ।

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Surah Yasin (Yaseen) | By Sheikh Abdur-Rahman As-Sudais | Full With Arabic Text (HD) | 36سورۃ یس

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surah yaseen

1) यासीन 2) वल कुर आनिल हकीम 3) इन्नका लमिनल मुरसलीन 4) अला सिरातिम मुस्तकीम 5) तनजीलल अजीज़िर रहीम 6) लितुन ज़िरा कौमम मा उनज़िरा आबाउहुम फहुम गाफिलून 7) लकद हक कल कौलु अला अकसरिहिम फहुम ला युअमिनून 8) इन्ना ज अलना फी अअना किहिम अगलालन फहिया इलल अजकानि फहुम मुकमहून  9) व जअल्ना मिम बैनि ऐदी हिम सद्दव वमिन खलफिहिम सद्दन फ अग शयनाहुम फहुम ला युबसिरून  10) वसवाउन अलैहिम अअनजर तहुम अम लम तुनजिरहुम ला युअमिनून

Surah Yaseen In Hindi 

11) इन्नमा तुन्ज़िरू मनित तब अर ज़िकरा व खाशियर रहमान बिल्गैब फबश्शिर हु बिमग फिरतिव व अजरुन करीम  12) इन्ना नहनू नुहयिलल मौता वनकतुबु मा क़द्दमु व आसाराहुम वकुल्ला शयइन अहसयनाहु फी इमामिम मुबीन  13) वज़ रिब लहुम मसलन असहाबल करयह इज़ जा अहल मुरसळून  14) इज़ अरसलना इलयहिमुस नैनी फकज जबूहुमा फ अज़्ज़ज़ना बिसा लिसिन फकालू इन्ना इलयकुम मुरसळून  15) कालू मा अन्तुम इल्ला बशरुम मिसळूना वमा अनजलर रहमानु मिन शय इन इन अन्तुम इल्ला तकज़िबुन

16) क़ालू रब्बुना यअलमु इन्ना इलयकुम लमुरसळून  17) वमा अलैना इल्लल बलागुल मुबीन  18) कालू इन्ना ततैयरना बिकुम लइल लम तनतहूँ लनरजु मन्नकूम वला यमस सन्नकुम मिन्ना अज़ाबुन अलीम 19) कालू ताइरुकुम म अकुम अइन ज़ुक्किरतुम बल अन्तुम क़ौमूम मुस रिफून  20) व जा अमिन अक्सल मदीनति रजुलुय यसआ काला या कौमित त्तबिउल मुरसलीन  21) इत तबिऊ मल ला यस अलुकुम अजरौ वहुम मुहतदून

22) वमालिया ला अअबुदुल लज़ी फतरनी व इलैहि तुरजऊन 23) अ अत्तखीज़ु मिन दुनिही आलिहतन इय युरिदनिर रहमानु बिजुर रिल ला तुगनी अन्नी शफ़ा अतुहुम शय अव वला यूनकिजून 24) इन्नी इज़ल लफी ज़लालिम मुबीन 25) इन्नी आमन्तु बिरब बिकुम फसमऊन  26) कीलद खुलिल जन्नह काल यालयत क़ौमिय यअलमून  27) बिमा गफरली रब्बी व जअलनी मिनल मुकरमीन

28) वमा अन्ज़लना अला क़ौमिही मिन बअ दिही मिन जुन्दिम मिनस समाइ वमा कुन्ना मुनजलीन  29) इन कानत इल्ला सैहतौ वाहिदतन फ इज़ा हुम् खामिदून 30) या हसरतन अलल इबाद मा यअ तीहिम मिर रसूलिन इल्ला कानू बिहा यस तहज़िउन  31) अलम यरव कम अह्लकना क़ब्लहुम मिनल कुरूनी अन्नहुम इलय्हीम ला यर जिउन 32) वइन कुल्लुल लम्मा जमीउल लदेना मुह्ज़रून

33) व आयतुल लहुमूल अरज़ुल मयतह अह ययनाहा व अखरजना मिन्हा हब्बन फमिनहु यअ कुलून  34) व ज अलना फीहा जन्नातिम मिन नखीलिव व अअनाबिव व फज्जरना फीहा मिनल उयून 35) लियअ कुलु मिन समरिही वमा अमिलत हु अयदी हिम अफला यशकुरून 36) सुब्हानल लज़ी ख़लक़ल अज़वाज कुल्लहा मिममा तुमबितुल अरज़ू वमिन अनफूसिहिम वमिम मा ला यअलमून 37) व आयतुल लहुमूल लैल नसलखु मिन्हुन नहारा फइज़ा हुम् मुजलिमून

38) वश शमसु तजरी लिमुस्त कररिल लहा ज़ालिका तक़्दी रूल अज़ीज़िल अलीम  39) वल कमर कद्दरनाहु मनाज़िला हत्ता आद कल उरजुनिल क़दीम  40) लश शम्सु यमबगी लहा अन तुद रिकल कमरा वलल लैलु साबिकुन नहार वकुल्लुन फी फलकिय यसबहून  41) व आयतुल लहुम अन्ना हमलना ज़ुररिय यतहूम फिल फुल्किल मशहून  42) व खलकना लहुम मिम मिस्लिही मा यरकबून

43) व इन नशअ नुगरिक हुम फला सरीखा लहुम वाला हुम युन्क़जून 44) इल्ला रह्मतम मिन्ना व मताअन इलाहीन 45) व इजा कीला लहुमुत तकू मा बैना ऐदीकुम वमा खल्फकुम ला अल्लकुम तुरहमून 46) वमा तअ तीहिम मिन आयतिम मिन आयाति रब्बिहिम इल्ला कानू अन्हा मुअ रिजीन 47) व इज़ा कीला लहुम अन्फिकू मिम्मा रजका कुमुल लाहू कालल लज़ीना कफरू लिल लज़ीना आमनू अनुत इमू मल लौ यशाऊल लाहू अत अमह इन अन्तुम इल्ला फ़ी ज़लालिम मुबीन

48) व यकूलूना मता हाज़ल व अदू इन कुनतुम सादिक़ीन 49) मा यन ज़ुरूना इल्ला सयहतव वहिदतन तअ खुज़ुहुम वहुम याखिस सिमून 50) फला यस्ता तीऊना तव सियतव वला इला अहलिहीम यरजिऊन 51) व नुफ़िखा फिस सूरि फ़इज़ा हुम मिनल अज्दासी इला रब्बिहीम यन्सिलून 52) कालू या वय्लना मम ब असना मिम मरक़दिना हाज़ा मा व अदर रहमानु व सदकल मुरसलून  53) इन कानत इल्ला सयहतव वहिदतन फ़ इज़ा हुम जमीउल लदयना मुहज़रून

54) फल यौम ला तुज्लमू नफ्सून शय अव वला तुज्ज़व्ना इल्ला बिमा कुंतुम तालमून 55) इन्ना अस हाबल जन्न्तिल यौमा फ़ी शुगुलिन फाकिहून 56) हुम व अज्वा जुहूम फ़ी ज़िलालिन अलल अरा इकि मुत्तकिऊन 57) लहुम फ़ीहा फाकिहतुव वलहुम मा यद् द ऊन 58) सलामुन कौलम मिर रब्बिर रहीम 59) वम ताज़ुल यौमा अय्युहल मुजरिमून 60) अलम अ अहद इल्य्कुम या बनी आदम अल्ला तअ बुदुश शैतान इन्नहू लकुम अद्व्वुम मुबीन

61) व अनि अ बुदूनी हज़ा सिरातुम मुस्तक़ीम 62) व लक़द अज़ल्ला मिन्कुम जिबिल्लन कसीरा अफलम तकूनू ता किलून 63) हज़िही जहन्नमुल लती कुन्तुम तू अदून 64) इस्लौहल यौमा बिमा कुन्तुम तक्फुरून  65) अल यौमा नाख्तिमु अल अफ्वा हिहिम व तुकल लिमुना अयदीहीम व तश हदू अरजू लुहुम बिमा कानू यक्सिबून 66) व लौ नशाउ लत मसना अला अ अयुनिहीम फ़स तबकुस सिराता फ अन्ना युबसिरून

67) व लौ नशाउ ल मसखना हुम अला मका नतिहिम फमस तताऊ मुजिय यौ वला यर जिऊन 68) वमन नुअमिर हु नुनक किस हु फिल खल्क अफला या किलून  69) वमा अल्लम नाहुश शिअरा वमा यम्बगी लह इन हुवा इल्ला जिक रुव वकुर आनुम मुबीन 70) लियुन जिरा मन काना हय्यव व यहिक कल कौ लु अलल काफ़िरीन 71) अव लम यरव अन्ना खलक्ना लहुम मिम्मा अमिलत अय्दीना अन आमन फहुम लहा मालिकून

72) व ज़ल लल नाहा लहुम फ मिन्हा रकू बुहुम व मिन्हा यअ कुलून 73) व लहुम फ़ीहा मनफ़िउ व मशारिबु अफला यश्कुरून  74) वत तखजू मिन दूनिल लाहि आ लिहतल ला अल्लहुम युन्सरून 75) ला यस्ता तीऊना नस्र हुम वहुम लहुम जुन्दुम मुह्ज़रून 76) फला यह्ज़ुन्का क़व्लुहुम इन्ना न अलमु मा युसिर रूना वमा युअलिनून 77) अव लम यरल इंसानु अन्ना खलक्नाहू मिन नुत्फ़ तिन फ़ इज़ा हुवा खासीमुम मुबीन

78) व ज़रबा लना मसलव व नसिया खल्कह काला मय युहयिल इजामा व हिय रमीम 79) कुल युहयीहल लज़ी अनश अहा अव्वला मर्रह वहुवा बिकुलली खल किन अलीम 80) अल्लज़ी जअला लकुम मिनश शजरिल अख्ज़रि नारन फ़ इज़ा अन्तुम मिन्हु तूकिदून 81) अवा लैसल लज़ी खलक़स समावाती वल अरज़ा बिका दिरिन अला य यख्लुका मिस्लहुम बला वहुवल खल्लाकुल अलीम 82) इन्नमा अमरुहू इज़ा अरादा शय अन अय यकूला लहू कुन फयकून 83) फसुब हानल लज़ी बियदिही मलकूतु कुल्ली शय इव व इलैही तुरज उन

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Surah Yaseen Tarjuma In Hindi

1) यासीन 2) क़ुराने हकीम की क़सम। 3) इस में कोई शक नहीं कि आप अल्लाह के पैगम्बरों में से हैं। 4) सीधे रस्ते पर हैं। 5) ये कुरान उस ज़ात की तरफ से उतारा जा रहा है जो ज़बरदस्त भी है रहम फरमाने वाला भी है। 6) ताकि आप उस कौम को ख़बरदार कर दें जिन के बाप दादा को ख़बरदार नहीं किया गया तो वो ग़फलत में पड़े हुए थे। 7) हक़ीक़त ये है कि उन में से अक्सर लोगों के बारे में बात हो पूरी हो चुकी है इसलिए वो ईमान नहीं लाते

8) हम ने उनकी गर्दनों में तौक डाल रखे हैं फिर वो थोडियों तक हैं तो उनके सर अकड़े पड़े हैं। 9) और हम ने एक आड़ उनके आगे खड़ी कर दी है और एक आड़ उनके पीछे खड़ी कर दी है और इसी तरह उन्हें हर तरफ से ढांक लिया है इसलिए उन्हें कुछ सुझाई नहीं देता 10) उनके लिए दोनों बातें बराबर हैं चाहे तुम उन्हें ख़बरदार करो या ख़बरदार न करो वो ईमान नहीं लायेंगे।

11) तुम तो सिर्फ ऐसे शख्स को ख़बरदार कर सकते हो जो नसीहत पर चले और खुदाए रहमान को देखे बगैर उस से डरे, चुनान्चे ऐसे शख्स को तुम मगफिरत और बा इज्ज़त अज्र की खुशखबरी सुना दो। 12) यक़ीनन हम हम ही मुर्दों को जिंदा करेंगे, और जो कुछ अमल उन्होंने आगे भेजे हैं हम उनको भी लिखते जाते हैं और उनके कामों के के जो असरात हैं उनको भी और हर चीज़ एक खुली किताब में हम ने गिन गिन कर रखी है।

13) और आप उनके सामने गाँव वालों की मिसाल दीजिये जब रसूल उनके पास पहुंचे थे। 14) जब हम ने उनके पास (शुरू में) दो रसूल भेजे तो उन्होंने दोनों को झुटलाया तो हम ने तीसरे के ज़रिये उनको क़ुव्वत दी तो उन सब ने कहा हम को तुम्हारी तरफ़ रसूल बना कर भेजा गया है। 15) वो लोग कहने लगे : तुम तो हमारे ही जैसे इंसान हो, खुदाए रहमान ने कोई चीज़ उतारी नहीं है तुम लोग सरासर झूट बोल रहे हो।

16) उन रसूलों ने कहा : हमारा परवरदिगार खूब जानता है कि हमें वाक़ई तुम्हारे पास रसूल बना कर भेजा गया है। 17) और हमारी ज़िम्मेदारी तो सिर्फ इतनी है कि साफ़ साफ़ पैग़ाम पहुंचा दें। 18) बस्ती वालों ने कहा : हम तो तुम लोगों को मनहूस समझते हैं, अगर तुम बाज़ न आये तो हम तुमको पत्थर मार मार कर हालाक कर देंगे और हमारी जानिब से तुम को दर्दनाक तकलीफ़ पहुंचेगी।

19) रसूलों ने कहा : तुम्हारी नहूसत खुद तुम्हारे साथ लगी हुई है, क्या ये बातें इस लिए कर रहे हो कि तुम्हें नसीहत की बात पहुंचाई गयी है ? असल बात ये है कि तुम खुद हद से गुज़रे हुए लोग हो।20) और शहर के किनारे से एक आदमी दौड़ता हुआ आया बोला, ए मेरी कौम रसूलों का कहा मान लो। 21) उन लोगों का कहा मान लो जो तुम से कोई उजरत नहीं मांग रहे, और सही रास्ते पर हैं।

22) आखिर मैं क्यूँ उस ज़ात की इबादत न करूं, जिस ने मुझे पैदा फ़रमाया, और उसी की तरफ तुम सब लौटाए जाओगे 23) क्या मैं उसके अलावा ऐसे माबूद बना लूं कि अगर रहमान मुझे नुकसान पहुँचाने का इरादा कर ले तो न उनकी सिफ़ारिश मेरे कुछ काम आ सकेगी और न वो मुझे बचा सकेंगे। 24) अगर मैंने ऐसा किया तो मैं खुली हुई गुमराही में जा पडूंगा

25) मैं तो तुम्हारे रब पर ईमान ला चुका हूं इसलिए मेरी बात सुन लो 26) (मगर जो लोग कुफ्र पर अड़े हुए थे उन्होंने उस ईमान लाने वाले को शहीद कर दिया चुनांचे खुदा की तरफ से) उसको हुक्म फरमाया गया कि तुम जन्नत में दाखिल हो जाओ (वह कहने लगे) काश ! मेरी कौम को यह बात मालूम हो जाती

27) कि मेरे रब ने मुझे माफ कर दिया है और मुझको बा इज्ज़त बन्दों में शामिल फरमा लिया है। 28) हमने उसके बाद उसकी कौम पर आसमान से कोई लश्कर नहीं भेजा और ना हमें इसकी जरूरत थी। 29) वह तो सिर्फ एक सख्त आवाज थी, फिर उसी लम्हे वह सब बुझ कर रह गए 30) अफसोस मेरे उन बंदों पर कि जब उनके पास कोई रसूल आता तो वह उसका मजाक उड़ाते

31) क्या उन्होंने गौर नहीं किया कि हमने उनसे पहले कितनी नस्लों को हलाक कर दिया वह उनके पास वापस नहीं आ सकते 32) और यकीनन सब के सब हमारे पास हाजिर कर दिए जाएंगे और33) उनके लिए एक निशानी यह बंजर जमीन भी है हमने उसको जिंदा कर दिया और उसमें से अनाज निकाला तो वह उससे खाते हैं। 34) और हमने उसमें खजूरों और अंगूरों के बागात पैदा किये और उस ज़मीन में चश्मे जारी कर दिए

35) ताकि लोग उसके फल खाएं और ये फ़ल उनके हाथों के बनाये हुए नहीं हैं, फिर भी वह ऐसा नहीं मानते 36) अल्लाह की ज़ात पाक है जिसने सबके जोड़े पैदा किए जमीन की पैदावार में भी और खुद इंसानों में और कितनी ऐसी चीजों में जिसको वह जानते ही नहीं 37) और उनके लिए एक निशानी रात भी है दिन को हम उससे हटा लेते हैं बस वह यकायक अंधेरे में रह जाते हैं।38) और सूरज अपने ठिकाने की तरफ चला जा रहा है, यह उस जात का मुकर्रर किया हुआ (निजाम) है जो बेहद ताकतवर और बड़ा ही बाखबर है।

39) चांद के लिए भी हमने मंजिलें मुकर्रर कर दी यहां तक कि वह सूखी हुई पुरानी टहनी की तरह हो जाता है। 40) ना सूरज की मजाल है कि वह चांद को आ पकड़े और ना रात दिन से पहले आ सकती है, सब के सब एक मदार में तैर रहे हैं। 41) उनके लिए एक निशानी यह भी है कि हमने उनकी नस्ल को भरी हुई कश्ती में सवार कर लिया42) और हमने उनके लिए कश्ती की तरह की और चीजें भी पैदा की हैं जिन पर वह सवार होते हैं।

43) और अगर हम चाहे तो उनको गर्क़ कर (डुबो) दें फिर ना उनकी फरियाद पर कोई पहुंचने वाला हो और ना वह निकाले जा सकें 44) मगर यह सिर्फ हमारी मेहरबानी है और एक वक्त तक के लिए फायदा मुहैया करना है। 45) और जब उनसे कहा जाता है ( अज़ाब ) से डरो, जो तुम्हारे सामने और पीछे हैं, तो शायद तुम पर रहम किया जाए (तो वह उसकी कोई परवाह नहीं करते)

46) और जब भी उनके पास उनके परवरदिगार की निशानियां में से कोई निशानी आती है तो वह उसे मुंह फेर लेते हैं। 47) और जब उनसे कहा जाता है कि अल्लाह तआला ने तुमको जो कुछ अता फ़रमाया है उसमें से खर्च करो तो ईमान न लाने वाले मुसलमानों से कहते हैं : क्या हम उन लोगों को खिलाएं, जिन को खिलाना अल्लाह को मंजूर होता तो खुद ही खिला देते ? तुम लोग खुली हुई गुमराही में पड़े हुए हो

48) और वह लोग कहते हैं अगर तुम सच्चे हो (तो बताओ कि) यह वादा कब पूरा होगा ? 49) वह लोग बस एक सख्त आवाज़ का इंतजार कर रहे हैं, जो उनको इस हालत में आ पकड़ेगी कि वह लड़ झगड़ रहे होंगे 50) फिर ना तो वह कोई वसीयत कर सकेंगे और ना अपने घरवालों की तरफ जा सकेंगे 51) और सूर फूंका जाएगा तो वह सब क़बरों से निकलकर अपने परवरदिगार की तरफ दौड़ पड़ेंगे

52) कहेंगे : हाय हमारी बदनसीबी हमको हमारी क़बरों से किस ने उठा दिया ? यही है वह वाकिया जिसका बेहद मेहरबान (खुदा) ने वादा फरमाया था, और अल्लाह के पैग़म्बरों ने सच ही कहा था53) बस यह एक सख्त आवाज होगी, फिर एक ही दम सब के सब हमारे सामने हाजिर कर दिए जाएंगे 54) फिर उस दिन किसी शख्स के साथ जरा भी नाइंसाफी नहीं होगी और तुमको तुम्हारे आमाल का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा

55) यक़ीनन जन्नत वाले लोग उस दिन मज़े उड़ाने में लगे होंगे 56) वह और उनकी बीवियां साये में टेक लगाए हुए मसेहरियों पर बैठे होंगे 57) उनके लिए जन्नत में मेवे भी होंगे और वह सारी चीजें भी जो वह मांगेंगे 58) (सबसे अहम् इनआम यह है कि) उनको मेहरबान परवरदिगार की तरफ से सलाम फरमाया जाएगा 59) और ( अल्लाह तआला फरमाएंगे:) ए गुनहगारों ! आज तुम अलग हो जाओ

60) ए आदम की औलाद ! क्या मैंने तुमको ताकीद नहीं की थी कि तुम शैतान की इबादत न करो कि वह तुम्हारा खुला हुआ दुश्मन है। 61) और यह कि तुम मेरी ही इबादत करना यही सीधा रास्ता है।62) और शैतान तो तुम में से बहुत से लोगों को गुमराह कर चुका है तो क्या तुम अक्ल नहीं रखते थे ? 63) यही वह दोजख़ ( जहन्नम ) है जिससे तुम्हें डराया जा रहा था 64) आज अपने कुफ्र करने की वजह से उस में दाखिल हो जाओ

65) आज हम उनके मुंह पर मुहर लगा देंगे, और उनकी हरकतों के बारे में उनके हाथ हम से बात करेंगे और उनके पांव गवाही देंगे 66) अगर हम चाहें तो उनकी आंखों को सपाट कर दें, फिर यह रास्ते की तरफ दौड़ें, तो कहां देख पाएंगे ? 67) और अगर हम चाहें तो उनकी अपनी जगह पर बैठे बैठे उनकी सूरतें इस तरह मस्ख कर दें कि यह न आगे बढ़ सकें और न पीछे लौट सकें

68) जिस शख्स को हम लंबी उम्र देते हैं उसकी पैदाइश को उलट देते हैं फिर भी क्या वो अक्ल से काम नहीं लेते 69) और हम ने (अपने) उन (पैगंबर) को ना शायरी सिखाई है, और ना यह बात उनके शायाने शान है यह तो बस एक नसीहत की बात है और ऐसा कुरान जो हक़ीक़त खोल खोल कर बयान करता है 70) ताकि ऐसे शख्स को खबरदार कर दें जो (क़ल्ब और रूह के एतबार से) जिंदा हो और ताकि ईमान लाने वालों पर हुज्जत पूरी हो जाए

71) क्या उन्होंने देखा नहीं कि जो चीजें हमने अपने हाथों से बनाई हैं उनमें से यह भी है कि हमने उनके लिए चौपाये पैदा कर दिए और ये उनके मालिक बने हुए हैं। 72) और हमने उन चौपायों को उनके काबू में कर दिया है चुनांचे उनमें से कुछ वो हैं जो उनकी सवारी बने हुए हैं और कुछ वो हैं जिन्हें ये खाते हैं। 73) उनको उन चौपायों से और भी फ़ायदे हासिल होते हैं और जानवरों में पीने की चीजें भी है तो क्या फिर भी यह शुक्र अदा नहीं करते

74) उन लोगों ने अल्लाह के सिवा दूसरे माबूद बना लिए हैं कि शायद उनकी मदद की जाए 75) (हालाँकि) उन में ये ताक़त ही नहीं है कि वह उनकी मदद कर सकें, बल्कि वो उन के लिए एक ऐसा (मुख़ालिफ़) लश्कर बनेंगे जिसे (क़यामत में उनके सामने) हाज़िर कर लिया जायेगा 76) आप उनकी बातों से ग़मगीन ना हों, वह जो कुछ छुपाते हैं और जो कुछ जाहिर करते हैं वह सब हमें मालूम है।

77) क्या इंसान ने गौर नहीं किया कि हमने तो उसको नुत्फे से पैदा किया, फिर वह खुला हुआ झगड़ालू हो गया ? 78) वह हमारे लिए मिसालें बयान करने लगा और अपनी पैदाइश को भूल गया, वह कहने लगा : जो हड्डियां गल चुकी है, उनको (दोबारा) कौन जिंदा करेगा 79) आप कह दीजिए : वही जिंदा करेगा जिसने उसको पहली दफा पैदा किया था और वह सब (चीजों को) पैदा करना जानता है।

80) जिस ने तुम्हारे लिए सब्ज़ दरख़्त से आग पैदा कर दी है फिर तुम उससे (आग) सुलगाते हो 81) क्या वह ज़ात जिसने आसमानों को और जमीन को पैदा किया है, इन (इंसानों) के जैसा पैदा नहीं कर सकती ? क्यों नहीं ? वह जरूर पैदा कर सकता है, वह खूब पैदा करने वाला और खूब जानने वाला है। 82) उसकी शान यह है कि जब वह किसी चीज का इरादा करता है तो उसको हुक्म फरमाता है हो जा, तो वह हो जाती है। 83) गर्ज़ कि वो ज़ात पाक है जिसके हाथों में हर चीज की हुकूमत है और उसी की तरफ तुम को लौट कर जाना है।

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Hazrat Aisha ( radi allahu anho) se riwayat he ke hazrat Muhammad sallahu alahi wasslam ne Farmaya ki Quran Mein Ek Surat Hai Jo Allah Ke Nzdeek bdi Azmat Waali Hai Jo isse Padhe Ga Allah Us Ko Shareef Ke Lawab Se Nawaze Ga Rabi Or MuZar Ki Tadaad Se Bhi Ziyada Afrad Ke Liye Is Surat Ke padhane Waale Ki Shafaat Qubul Ki Jae Gi Is Azmat Wali Surah Ka Name Surah Yaseen hai Rabi Aur Muzar Arab Ke 2 Mashhur Qabile The Aur Un Se Talluq Rakhne Wale Afrad Rakhne Wale Afrad Ki Tadad Bahut Ziyada Thi .

Hazrat Anas Radi Allahu anhu Huzuoor Sallahu alaihi wasslam Se Riwayat karte hai ke Har Chiz Ka Aik Dil Hota Hai , Quran Ka bhi Aik dil Surah Yaseen hai .

Jo yasin sharif padhega use us ki iqraar ki wajeh se 10 baar quraan majid padhne ka Sawab Milega Ise Tirmizi Ne Riwayat kiya (Tafseer Khazana)

Hadees :- Huzur Allahu alaihi wasallam Ne Farmaya ke Allah ki razamandi ke liye jo shaksh Surah Yaseen padhega Us ke pehle gunah maaf kar diye jayeinge lihaza is surah ko marne walo ke pass padha karo (Beahqi Shah Al Imaan)

Huzur Allahu alaihi wasslam ne farmaya ke jis ne raat Ke waqt Surah Yaseen Padhi Us Halat main subha ko uthega ke woh Bakhsha Gunaah hoga ( Ibne Kasir=)

Hazrat Ibne abbas radi allahu abhi se riwayat hai ke huzur dillagi alaihi wasallam ne Farmaya ki meri yeh tamanna hai ke yeh Surah Yaseen har ummati ke dil me ho ( Tafsire Ibne Kasir)

Hazrat Ata bin rabba tbi se mari he ke mujhe yeh hadees pahuchi hai ke jo aadmi din ke aagaz me surah yaseen sharif padhega us ki tmam zaruri yar puri kr di jayegi .

allah hm sbko surah yaseen padhne ki Taufeeq ata farmae . ameen .

بسم اللہ الرحمن الرحیم : In The Name of Allah, The Most Beneficent, The Most Merciful : bismillah hir rahman Nirraheem

Hadith :- Usman Bin Affan (R.A) Reported:-

The Messenger Of ALLAH (صلی اللہ علیہ والہ وسلم) Said:-

“The Best Amongst you is The One who Learn The Quran and Teaches It”.

(Al-Bukhari)

#Quran #surahyaseen #yasin

Sūrah Yā-Sīn (also Yaseen; Arabic: سورة يس‎) is the 36th chapter (surah) of the Quran. It has 83 verses (ayahs) and is one of the Meccan surahs,

although some scholars maintain that verse 12 is from the Medinan period. The name of the chapter comes from the two letters of the first verse of the chapter,

which has caused much scholarly debate, and which Tafsir al-Jalalayn, a Sunni exegesis (tafsir), interprets by saying, “God knows best what He means by these [letters].” Yasin is also one of the names of the Prophet Muhammad, as reported in a saying of Ali, “I heard the Messenger of God say, ‘Verily God has named me by seven names in the Quran: Muhammad [3:144; 33:40; 47:2; 48:29], Ahmad [61:6], Tā Hā [20:1], Yā Sīn [36:1], thou enwrapped [alhi3:1], thou who art covered [al-Mudaththir; 74:1], and servant of God [ʿAbd Allāh; 72:19].’

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Yasin Suresi Okunuşu
Bismillahirrahmanirrahîm

Yâsîn.

Vel Kur’ân-il hakîm.

İnneke leminel mürselîn.

Alâ sırâtın müstakîm.

Tenzîlel azîzirrahîm.

Litünzira kavmen mâ ünzire âbâühüm fehüm ğâfilûn.

Lekad hakkaIkavIü alâ ekserihim fehüm lâ yü’minûn.

İnnâ ceaInâ fî a’nâkihim agIâIen fehiye ilel ezkâni fehüm mukmehûn.

Ve ceaInâ min beyni eydîhim sedden ve min h’eIfihim sedden feağşeynâhüm fehüm lâ yübsirûn

Ve sevâün aleyhim eenzertehüm em lem tünzirhüm lâ yü’minûn

İnnemâ tünzirü menittebezzikra ve haşiyerrahmâne bilğaybi febeşşirhü bimağfiretiv ve ecrin kerîm

İnnâ nahnü nuhyil mevtâ ve nektübü mâ kaddemû ve âsârehüm ve külle şey’in ahsaynâhü fî imâmin mübîn

Vadrib lehüm meseIen ashâbel karyeh. İz câehel mürselûn

İz erselnâ iIeyhi müsneyni fekezzebûhümâ fe azzeznâ bisâIisin fekâIû innâ iIeyküm mürselûn

Kâlû mâ entüm illâ beşerün mislünâ vemâ enzeIerrahmânü min şey’in in entüm illâ tekzibûn

Kâlû rabbünâ ya’lemü innâ iIeyküm lemürselûn

Vemâ aIeynâ illel belâgul mübîn

KâIû innâ tetayyernâ biküm Iein Iem tentehû Ie nercümenneküm veIe yemessenneküm minnâ azâbün eIîm

KâIû tâirüküm meaküm ein zûkkirtum beI entüm kavmün müsrifûn

Vecâe min aksaImedineti racüIün yes’â kâIe yâ kavmittebiuI mürseIîn

İttebiû men Iâ yeseIüküm ecran ve hüm muhtedûn

Vemâ Iiye Iâ a’büdüIIezî fetarenî ve iIeyhi türceûn

Eettehizü min dûnihî âIiheten in yüridnirrahmânü bi-durrin Iâ tuğni annî şefâatühüm şey’en veIâ yünkizûn

İnnî izen Iefî daIâIin mübîn

İnnî âmentü birabbiküm fesmeûn

KîIedhuIiI cenneh, kâIe yâIeyte kavmî yâ’Iemûn

Bimâ gafereIî rabbî ve ceaIenî mineI mükremîn

Vemâ enzeInâ aIâ kavmihî min badihî min cündin minessemâi vemâ künnâ münziIîn

İn kânet iIIâ sayhaten vâhideten feizâhüm hâmidûn

Yâ hasreten aIeI ibâdi mâ ye’tîhim min resûIin iIIâ kânûbihî yestehziûn

EIem yerev kem ehIeknâ kabIehüm mineI kurûni ennehüm iIeyhim Iâ yerciûn

Ve in küIIün Iemmâ cemî’un Iedeynâ muhdarûn

Ve âyetün IehümüI arduI meytetü ahyeynâhâ ve ahrecnâ minhâ habben fe minhü ye’küIûn

Ve ceaInâ fîhâ cennâtin min nahîIiv ve a’nâb ve feccernâ fîha mineI uyûn

Liye’küIû min semerihî vemâ amiIethü eydîhim efeIâ yeşkürûn

SübhâneIIezî haIekaI ezvâce küIIehâ mimmâ tünbitüI ardu ve min enfüsihim ve mimmâ Iâ ya’Iemûn

Ve âyetün IehümüIIeyü nesIehu minhünnehâre fe izâhüm muzIimûn

Veşşemsü tecrî Iimüstekarrin Iehâ zâIike takdîruI azîziI aIîm

VeIkamere kaddernâhü menâziIe hattâ âdekeI urcûniI kadîm

Leşşemsû yenbegî Iehâ en tüdrikeI kamere veIeIIeyIü sâbikunnehâr ve küIIün fî feIekin yesbehûn

Ve âyetüI Iehüm ennâ hameInâ zürriyyetehüm fiI füIkiI meşhûn

Ve haIâknâ Iehüm min misIihî mâ yarkebûn

Ve in neşe’ nugrıkhüm feIâ sarîha Iehüm veIâhüm yünkazûn

İllâ rahmeten minnâ ve metâan iIâ hîn

Ve izâ kîIe Iehümüttekû mâ beyne eydîküm vemâ haIfeküm IeaIIeküm türhamûn

Vemâ te’tîhim min âyetin min âyâti rabbihim iIIâ kânû anhâ mu’ridîn

Ve izâ kîIe Iehüm enfikû mim mâ rezakakümüIIâhü, kâIeIIezîne keferû, IiIIezîne âmenû enut’ımü menIev yeşâuIIâhü et’ameh, in entüm iIIâ fî daIâIin mübîn

Ve yekûIûne metâ hâzeI va’dü in küntüm sâdikîn

Mâ yenzurûne iIIâ sayhaten vâhideten te’huzühüm vehüm yehissimûn

FeIâ yestetîûne tavsıyeten veIâ iIâ ehIihim yerciûn

Ve nüfiha fîssûri feizâhüm mineI ecdâsi iIâ rabbihim yensiIûn

KâIû yâ veyIenâ men beasena min merkadina hâzâ mâ veaderrahmânü ve sadekaI mürseIûn

İn kânet iIIâ sayhaten vâhideten feizâ hüm cemî’un Iedeynâ muhdarûn

Felyevme lâ tuzlemu nefsun şey’en velâ tuczevne illâ mâ kuntum ta’melûn(e)

İnne ashâbeI cennetiI yevme fîşüğuIin fâkihûn

Hüm ve ezvâcühüm fî zıIâIin aIeI erâiki müttekiûn

Lehüm fîhâ fâkihetün ve Iehüm mâ yeddeûn

SeIâmün kavIen min rabbin rahîm

VemtâzüI yevme eyyüheI mücrimûn

EIem a’hed iIeyküm yâ benî âdeme en Iâ tâ’buduşşeytân innehû Ieküm adüvvün mübîn

Ve enî’budûnî, hâzâ sırâtun müstekîm

Ve Iekad edaIIe minküm cibiIIen kesîran efeIem tekûnû ta’kıIûn

Hâzihî cehennemüIIetî küntüm tûadûn

lsIevheI yevme bimâ küntüm tekfürûn

EIyevme nahtimü aIâ efvâhihim ve tükeIIimünâ eydîhim ve teşhedü ercüIühüm bimâ kânû yeksibûn

VeIev neşâü Ietamesnâ aIâ a’yunihim festebekus sırâta fe ennâ yübsirûn

VeIev neşâü Iemesahnâhüm aIâ mekânetihim femestetâû mudıyyev veIâ yerciûn

Ve men nüammirhü nünekkishü fiIhaIkı, efeIâ ya’kiIûn

Ve mâ aIIemnâhüşşi’ra vemâ yenbegî Ieh in hüve iIIâ zikrün ve kur’ânün mübîn

Liyünzira men kâne hayyen ve yehıkkaI kavIü aIeI kâfirîn

EveIem yerav ennâ haIaknâ Iehüm mimmâ amiIet eydîna en âmen fehüm Iehâ mâIikûn

Ve zeIIeInâhâ Iehüm feminhâ rekûbühüm ve minhâ ye’küIûn

Ve Iehüm fîhâ menâfiu ve meşâribü efeIâ yeşkürûn

Vettehazû min dûniIIâhi âIiheten IeaIIehüm yünsarûn

Lâ yestetîûne nasrahüm ve hüm Iehüm cündün muhdarûn

FeIâ yahzünke kavIühüm. İnnâ na’Iemü mâ yüsirrûne vemâ yu’Iinûn

EveIem yeraI insânü ennâ haIaknâhü min nutfetin feizâ hüve hasîmün mübîn

Ve darebe Ienâ meseIen ve nesiye haIkah kaIe men yuhyiI izâme ve hiye ramîm

KuI yuhyiheIIezî enşeehâ evveIe merrah ve hüve biküIIi haIkın aIîm

EIIezî ceaIe Ieküm mineşşeceriI ahdari nâren feizâ entüm minhü tûkidûn

EveIeyseIIezî haIakassemâvati veI arda bikâdirin aIâ ey yahIüka misIehüm, beIâ ve hüveI haIIâkuI aIîm

İnnema emrühû izâ erâde şey’en en yekûIe Iehû kün, feyekûn

FesübhaneIIezî biyedihî meIekûtü küIIi şey’in ve iIeyhi türceûn.

Yasin Suresi Anlamı
Rahman ve Rahim olan Allah’ın (c.c) adıyla

Yâ Sîn.

(Ey Muhammed!) Hikmet dolu Kur’an’a andolsun ki,

Sen elbette (peygamber) gönderilenlerdensin.

Dosdoğru bir yol üzeresin.

Kur’an, mutlak güç sahibi, çok merhametli Allah tarafından indirilmiştir.

Ataları uyarılmamış, bu yüzden de gaflet içinde olan bir kavmi uyarman için indirilmiştir.

Andolsun, onların çoğu üzerine o söz (azap) hak olmuştur. Artık onlar iman etmezler.

Onların boyunlarına demir halkalar geçirdik, o halkalar çenelerine dayanmıştır. Bu sebeple kafaları yukarıya kalkık durumdadır.

Biz, onların önlerine bir set, arkalarına da bir set çekip gözlerini perdeledik. Artık görmezler.

Onları uyarsan da, uyarmasan da onlar için birdir, inanmazlar.

Sen ancak Zikr’e (Kur’an’a) uyanı ve görmediği hâlde Rahmân’dan korkan kimseyi uyarırsın. İşte onu bir bağışlanma ve güzel bir mükâfatla müjdele.

Şüphesiz biz, ölüleri mutlaka diriltiriz. Onların yaptıklarını ve bıraktıkları eserlerini yazarız. Biz, her şeyi apaçık bir kitapta (Levh-i Mahfuz’da) bir bir kaydetmişizdir.

+ Devamı…

(Ey Muhammed!) Onlara, o memleket halkını örnek ver. Hani oraya elçiler gelmişti.

Hani biz onlara iki elçi göndermiştik de onları yalancı saymışlardı. Biz de onlara üçüncü bir elçi ile destek vermiştik. Onlar, “Şüphesiz biz size gönderilmiş elçileriz” dediler.

Onlar şöyle dediler: “Siz de ancak bizim gibi insansınız. Rahmân, hiçbir şey indirmemiştir. Siz sadece yalan söylüyorsunuz.”

(Elçiler ise) şöyle dediler: “Bizim gerçekten size gönderilmiş elçiler olduğumuzu Rabbimiz biliyor.”

“Bize düşen ancak apaçık bir tebliğdir.”

Dediler ki: “Şüphesiz biz sizin yüzünüzden uğursuzluğa uğradık. Eğer vazgeçmezseniz, sizi mutlaka taşlarız ve bizim tarafımızdan size elem dolu bir azap dokunur.”

Elçiler de, “Uğursuzluğunuz kendinizdendir. Size öğüt verildiği için mi (uğursuzluğa uğruyorsunuz?). Hayır, siz aşırı giden bir kavimsiniz” dediler.

Şehrin öbür ucundan bir adam koşarak geldi ve şöyle dedi: “Ey kavmim! Bu elçilere uyun.”

“Sizden hiçbir ücret istemeyen kimselere uyun, onlar hidayete erdirilmiş kimselerdir.”

“Hem ben, ne diye beni yaratana kulluk etmeyeyim. Oysa siz de yalnızca O’na döndürüleceksiniz.”

“O’nu bırakıp da başka ilâhlar mı edineyim? Eğer Rahmân bana bir zarar vermek istese, onların şefaati bana hiçbir fayda sağlamaz ve beni kurtaramazlar.”

“O taktirde ben mutlaka açık bir sapıklık içinde olurum.”

“Şüphesiz ben sizin Rabbinize inandım. Gelin, beni dinleyin!”

(Kavmi onu öldürdüğünde kendisine) Cennete gir” denilince. “Keşke, dedi, kavmim bilseydi!”

Rabbimin beni bağışladığını ve beni ikram edilenlerden kıldığını.

Kendisinden sonra kavmi üzerine (onları cezalandırmak için) gökten hiçbir ordu indirmedik. İndirecek de değildik.

Sadece korkunç bir ses oldu. Bir anda sönüp gittiler.

Yazık o kullara! Kendilerine bir peygamber gelmezdi ki, onunla alay ediyor olmasınlar.

Kendilerinden önce nice nesilleri helâk ettiğimizi; onların artık kendilerine dönmeyeceklerini görmediler mi?

Onların hepsi de mutlaka toplanıp (hesap için) huzurumuza çıkarılacaklardır.

Ölü toprak onlar için bir delildir. Biz, onu diriltir ve ondan taneler çıkarırız da onlardan yerler.

Orada nice hurma bahçeleri ve üzüm bağları meydana getirdik, içinden sular fışkırttık;

Onun ürünlerinden ve kendi elleriyle ürettiklerinden yesinler diye. Hâlâ şükretmeyecekler mi?

Yerin bitirdiği şeylerden, insanların kendilerinden ve (daha) bilemedikleri (nice) şeylerden, bütün çiftleri yaratanın şanı yücedir.

Gece de onlar için bir delildir. Gündüzü ondan çıkarırız, bir de bakarsın karanlık içinde kalmışlardır.

Güneş de kendi yörüngesinde akıp gitmektedir. Bu, mutlak güç sahibi, hakkıyla bilen Allah’ın takdiri (düzenlemesi)dir.

Ayın dolaşımı için de konak yerleri (evreler) belirledik. Nihayet o, eğrilmiş kuru hurma dalı gibi olur.

Ne güneş aya yetişebilir, ne de gece gündüzü geçebilir. Her biri bir yörüngede yüzmektedir.

Onların soylarını dolu gemide taşımamız da onlar için bir delildir.

Biz, onlar için o gemi gibi binecekleri nice şeyler yarattık.

Biz istesek onları suda boğarız da kendileri için ne imdat çağrısı yapan olur, ne de kurtarılırlar.

Ancak tarafımızdan bir rahmet olarak ve bir süreye kadar daha yaşasınlar diye kurtarılırlar.

Onlara, “Önünüzde ve arkanızda olan şeylerden (dünya ve ahirette göreceğiniz azaplardan) sakının ki size merhamet edilsin” denildiğinde yüz çevirirler.

Onlara Rablerinin âyetlerinden bir âyet gelmez ki ondan yüz çeviriyor olmasınlar.

Onlara, “Allah’ın sizi rızıklandırdığı şeylerden Allah yolunda harcayın” denildiği zaman, inkâr edenler iman edenlere, “Allah’ın, dilemiş olsa kendilerini doyurabileceği kimselere mi yedireceğiz? Siz ancak apaçık bir sapıklık içindesiniz” derler.

“Eğer doğru söyleyenlerseniz, bu tehdit ne zaman gelecek?” diyorlar.

Onlar ancak, çekişip dururlarken kendilerini yakalayacak korkunç bir ses bekliyorlar.

Artık ne birbirlerine tavsiyede bulunabilirler, ne de ailelerine dönebilirler.

Sûra üfürülür. Bir de bakarsın, kabirlerden çıkmış, Rablerine doğru akın akın gitmektedirler.

Şöyle derler: “Vay başımıza gelene! Kim bizi diriltip mezarımızdan çıkardı? Bu, Rahman’ın vaad ettiği şeydir. Peygamberler doğru söylemişler.”

Sadece korkunç bir ses olur. Bir de bakarsın, hepsi birden toplanıp huzurumuza çıkarılmışlardır.

O gün kimseye, hiç mi hiç zulmedilmez. Size ancak işlemekte olduğunuz şeylerin karşılığı verilir.

Şüphesiz cennetlikler o gün nimetlerle meşguldürler, zevk sürerler.

Onlar ve eşleri gölgelerde koltuklara yaslanmaktadırlar.

Onlar için orada meyveler vardır. Onlar için diledikleri her şey vardır.

Çok merhametli olan Rab’den bir söz olarak (kendilerine) “Selâm” (vardır).

(Allah, şöyle der:) “Ey suçlular! Ayrılın bu gün!”

“Ey Âdemoğulları! Ben, size, şeytana kulluk etmeyin. Çünkü o, sizin için apaçık bir düşmandır.

Bana kulluk edin. İşte bu dosdoğru yoldur, diye emretmedim mi?”

“Andolsun, o sizden pek çok nesli saptırmıştı. Hiç düşünmüyor muydunuz?”

“İşte bu, tehdit edildiğiniz cehennemdir.”

“İnkâr ettiğinizden dolayı bugün girin oraya!”

O gün biz onların ağızlarını mühürleriz. Elleri bize konuşur, ayakları da kazandıklarına şahitlik eder.

Eğer dileseydik, onların gözlerini büsbütün kör ederdik de (bu hâlde) yola koyulmak için didişirlerdi. Fakat nasıl görecekler ki?!

Yine eğer dileseydik, oldukları yerde başka yaratıklara dönüştürürdük de ne ileri gidebilirler, ne geri dönebilirlerdi.

Kime uzun ömür verirsek, onu yaratılış itibariyle tersine çeviririz (gücünü azaltırız). Hâlâ düşünmeyecekler mi?

Biz, o Peygamber’e şiir öğretmedik. Bu, ona yaraşmaz da. O(na verdiğimiz) ancak bir öğüt ve apaçık bir Kur’an’dır.

(Aklen ve fikren) diri olanları uyarması ve kâfirler hakkındaki o sözün (azabın) gerçekleşmesi için Kur’an’ı indirdik.

Görmediler mi ki, biz onlar için, ellerimizin (kudretimizin) eseri olan hayvanlar yarattık da onlar bu hayvanlara sahip oluyorlar.

Biz, o hayvanları kendilerine boyun eğdirdik. Onlardan bir kısmı binekleridir, bir kısmını da yerler.

Onlar için bu hayvanlarda (daha pek çok) yararlar ve içecekler vardır. Hâlâ şükretmeyecekler mi?

Belki kendilerine yardım edilir diye Allah’ı bırakıp da ilâhlar edindiler.

Onlar, ilâhlar için (hizmete) hazır asker oldukları hâlde, ilâhlar onlara yardım edemezler.

(Ey Muhammed!) Artık onların sözü seni üzmesin. Çünkü biz, onların gizlediklerini de açığa vurduklarını da biliyoruz.

İnsan, bizim, kendisini az bir sudan (meniden) yarattığımızı görmedi mi ki, kalkmış apaçık bir düşman kesilmiştir.

Bir de kendi yaratılışını unutarak bize bir örnek getirdi. Dedi ki: “Çürümüşlerken kemikleri kim diriltecek?”

De ki: “Onları ilk defa var eden diriltecektir. O, her yaratılmışı hakkıyla bilendir.”

O, sizin için yeşil ağaçtan ateş yaratandır. Şimdi siz ondan yakıp duruyorsunuz.

Gökleri ve yeri yaratan Allah’ın, onların benzerini yaratmaya gücü yetmez mi? Evet yeter. O, hakkıyla yaratandır, hakkıyla bilendir.

Bir şeyi dilediği zaman, O’nun emri o şeye ancak “Ol!” demektir. O da hemen oluverir.

Her şeyin hükümranlığı elinde olan Allah’ın şanı yücedir! Siz yalnız O’na döndürüleceksiniz.

YASİN SURESİ DUASI

Bismillahirrahmanirrahim

Allahümme rabbena ya rabbena tekabbel minna duaena vekdi hacetena bihurmeti sureti yasin ve ecirna minennari vemin azabil kabri ve min şerri sualin bi fadli sureti yasin yarabbel alemiyne veselemun alel mürseliyne velhamdülillahi rabbil alemin.

YASİN SURESİ DUASI TÜRKÇE MEALİ

Esirgeyen ve Bağışlayan Allah’ın Adıyla

Yasin suresinin hurmetine dualarımızı kabul ve ihtiyaçlarımızı eda buyur. Ey Rabbil Alemin! Yasin suresinin faziletine bizi ateşten, kabir azabından ve sualin şerrinden koru. Ve peygamberlere selam olsun. Hamd Alemlerin Rabbi Allah’a mahsustur.

YASİN SURESİ FAZİLETLERİ

Yâsîn’in de içinde yer aldığı otuz kadar sûrenin (mesânî) Hz. Peygamber’e İncil yerine verildiğini belirten hadisin sahih olduğu kabul edilmiştir (Müsned, IV, 107; İbrâhim Ali, s. 224-225, 292). Sûrenin fazileti hakkında birçok hadis rivayet edilmiştir. Bunlardan biri, “Yâsîn sûresini geceleri okuyan kimsenin günahları bağışlanır” meâlinde olup (Dârimî, “Feżâʾilü’l-Ḳurʾân”, 21; İbrâhim Ali, s. 292-295) sahih görülmüştür. Her şeyin bir özü (kalbi) ve odak noktasının bulunduğunu, Kur’an’ın odak noktasının Yâsîn olduğunu belirten, Yâsîn sûresinin ölüler için veya ölmek üzere olanların yanında okunmasını tavsiye eden rivayetler ise zayıf sayılmıştır (Müsned, V, 26 [nşr. Müessesetü’r-risâle, XXX, 417-418]; Dârimî, “Feżâʾilü’l-Ḳurʾân”, 21; İbn Mâce, “Cenâʾiz”, 4; Ebû Dâvûd, “Cenâʾiz”, 19; Tirmizî, “Feżâʾilü’l-Ḳurʾân”, 7; İbrâhim Ali, s. 171-172, 292-301). Bazı tefsir kitaplarında (meselâ bk. Zemahşerî, V, 198; Beyzâvî, III, 448) bunlardan başka isnadsız kaydedilen fazilet rivayetleri de vardır.

Yâsîn sûresinin tefsiri konusunda çok sayıda eser kaleme alınmıştır. Bunun önemli sebeplerinden biri muhtemelen faziletine dair rivayet edilen hadisler, diğeri de ölüler üzerine okunmasının tavsiye edilmesidir. Süleymaniye Kütüphanesi’nde 100 civarında Yâsîn tefsiri, havâs ve tercüme kayıtları bulunmaktadır. Bu kayıtların yirmisi Hamâmîzâde Ali Efendi’nin Yâsîn tefsirine aittir (İstanbul 1262, 1265, 1273, 1286, 1294, 1316, 1320). Ebûishakzâde Esad Efendi’nin Ḫulâṣatü’t-tebyîn fî tefsîri sûre-i Yâsîn adlı eserinin yine bu kütüphanede on civarında kaydı vardır. İstanbul’un ilk kadısı olan Hızır Bey Çelebi’nin Tefsîr-i Yâsîn-i Şerîf’i Ayşe Humeyra Aslantürk tarafından sadeleştirilerek yayımlanmıştır (Yâsîn-i Şerif Tefsîri, İstanbul 1997; Isparta 2007). Davut Aydüz Kur’ân-ı Kerîm’in Kalbi Yâsîn Sûresi Tefsiri adıyla bir çalışma yapmıştır (İstanbul 2004).

YASİN SURESİ İLE İLGİLİ HADİS
Peygamber Efendimiz Hz. Muhammed (s.a.v) şöyle buyurmaktadır: “Her şeyin bir kalbi vardır. Kur’ân’ın kalbi de Yâsin’dir. Kim Yâsin’i okursa, Allah onun okumasına, Kur’ân’ı on kere okumuş gibi sevap yazar.” (Tirmizî, Fedâilu’l-Kur’n, 7; Dârimî, Fedâilu’l-Kur’ân, 21)

YASİN SURESİ TEFSİRİ

Yâsîn sûresinde İslâm akaidinin üç esasını teşkil eden tevhid, nübüvvet ve âhiret konuları tabiatın mükemmel kuruluşu ve işleyişinden deliller getirilerek anlatılır; bu arada iman-küfür mücadelesi çerçevesinde geçmiş kavimlerden ibret verici örnekler zikredilir. Dört bölüm halinde incelenmesi mümkün olan sûrenin birinci bölümünde ana konu Hz. Peygamber’in nübüvvetinin ispatı ve Kur’an’ın vahiy ürünü oluşudur.

Sûrenin ilk âyetini teşkil eden “yâsîn” büyük bir ihtimalle Hz. Muhammed’e bir hitaptır (Âlûsî, XXII, 525; krş. Taberî, XXII, 178). Ardından Kur’an’a yemin edilerek Muhammed’in Allah’a ulaştıran yol (sırât-ı müstakîm) üzerinde bulunan peygamberlerden olduğu,

Kur’an’ın da gafletten bir türlü kurtulamayan kitleleri uyarmak amacıyla Allah tarafından indirildiği ifade edilir. Ancak gönüllerini ilâhî gerçeklere açmayan, Cenâb-ı Hakk’ı anıp kalpleri ürpermeyen ve iradelerini hak dine yönlendirmeyen insanların bütün uyarılara rağmen iman

etmeyecekleri bildirilir; mükelleflerin işledikleri fiillerin her şeyi içeren bir kütükte kaydedildiği belirtilir (âyet 1-12). Sûrenin ikinci bölümü kendilerine Hak dinin tebliğcilerinin gönderildiği bir yerleşim yeri halkının (ashâbü’l-karye) kıssası hakkındadır. Bu yerleşim yerine önce iki tebliğci gelmiş, ardından bunları destekleyen üçüncüsü gönderilmiştir. Ancak şehir halkı elçilere yalancı demiş,

kendilerine uğursuzluk getirdiklerini ileri sürmüş, tebliğden vazgeçmedikleri takdirde işkenceyle öldürüleceklerini söylemiştir. O sırada şehrin uzak yerlerinden gelen bir kişi halkı iman etmeye teşvik ederken kendisi de iman etmiş, fakat inkârcılar tarafından öldürülmüş, nihayet o yerleşim yerinin halkı korkunç bir sesle helâk edilmiştir (âyet 13-32).

Müfessirler söz konusu şehrin Antakya, elçilerin havâriler, halkın Romalılar, uzaktan gelen kişinin de Habîb en-Neccâr olabileceğini kaydetmişse de gerek Hıristiyanlığın yayılışı gerekse Antakya’nın tarihi bakımından bu açıklamalar isabetli görülmemiştir (bk. ASHÂBÜ’l-KARYE; HABÎB en-NECCÂR). Kur’an’da mevcut kıssaların çoğunda olduğu gibi yerleri ve hitap edilen insanları bilinmeyen bu kıssadan da amaç tarihî bilgi vermek değil kıssadan hisse alınmasını sağlamaktır.

Sûrenin üçüncü bölümünde insanların hayatlarını sürdürdükleri yeryüzünün besleyici özelliğine, gece ile gündüz, güneşle ay arasındaki düzen ve âhenge, yeryüzündeki çiçek, bitki vb. şeyler, ayrıca insanlar ve insanların henüz vâkıf olamadığı nice canlı arasındaki tozlaşma ve döllenmeye, gemilerin denizde batmadan

seyretmesine temas edilerek Allah’ın birliği ve yüceliğine dikkat çekilir; bütün bu delil ve işaretlere rağmen inkârcıların dinî gerçeklerden yüz çevirdikleri ifade edilir (âyet 33-47). Yâsîn sûresinin dördüncü bölümü âhiretin varlığı ve âhiret âleminin tasvirine dairdir. Burada kıyametin ansızın kopacağı bildirildikten sonra vukuu

hakkında kısaca bilgi verilir. Ardından cennetin tasvirine, cehennemliklerin bedbahtlığına değinilir; onların dünyada iddia ettikleri gibi Kur’an’ın bir şair sözü değil vahiy ürünü olduğu zikredilir. Dünya hayatında insan türüne verilen nimetlerin bir kısmı sayılır; buna rağmen inkârcıların kendilerine hiçbir fayda sağlamayan putlara taptıkları belirtilir.

Sûrenin son âyetlerinde, görünürde spermden meydana gelen insanın dünyaya geliş şeklini göz ardı ederek, “Çürümüş kemikleri kim diriltecek?” diye soran inkârcıya, “İlk defa yaratmış olan diriltecek” şeklinde cevap verilir; bu kanıt, “Sizin için yeşil ağaçtan ateş çıkaran (krş. Mâtürîdî, XII, 114; Elmalılı, V, 4042), bütün tabiatı yaratan Allah ölülerin benzerini yaratmaya kādir değil mi?” ifadesiyle desteklenir. Sûre İslâm’ın tevhid ve âhiret inancına bir defa daha vurgu yapan âyetlerle sona erer (âyet 48-83).